“जिसे सबने नाकाम समझा”(एक लड़के की कहानी जिसने सबको गलत साबित कर दिया)
“जिसे सबने नाकाम समझा” (एक लड़के की कहानी जिसने सबको गलत साबित कर दिया) गांव के आखिरी छोर पर एक पुराना सा मकान था। उसी मकान में रहता था अर्जुन – एक ऐसा लड़का जिसे गांव में कोई गंभीरता से नहीं लेता था। अर्जुन का रंग सांवला था, शरीर पतला-दुबला, और उसकी आंखों में हमेशा एक अलग सी चमक होती थी — जैसे कुछ बड़ा सोच रहा हो। लेकिन उसके पास था कुछ नहीं — ना पैसे, ना कपड़े, ना कोई सपोर्ट। मां-बाप मजदूरी करते थे, और अर्जुन की पढ़ाई का सपना उनके लिए बोझ लगता। गांव वाले कहते — “इससे कुछ नहीं होगा।” “ना शक्ल है, ना अक्ल।” “पढ़ने-लिखने का क्या फायदा? जूते ही सिलने हैं।” हर जगह ताने, हर दिन अपमान। लेकिन अर्जुन ने कभी किसी को जवाब नहीं दिया। वो बस चुपचाप हर सुबह नदी किनारे बैठकर एक पुरानी किताब पढ़ता था। किसी ने उसे टीचर से फटे पुराने पन्ने मांगते देखा, किसी ने उसे पेड़ के नीचे बैठकर नोट्स बनाते। उसे फर्क नहीं पड़ता था कि लोग क्या कह रहे हैं — क्योंकि वो जानता था, सपनों का मज़ाक उड़ाना सबसे आसान काम होता है। दिन बीते, साल बदले। गांव में बच्चे बड़े हो गए, किसी ने दारू की दुकान खोल ली, कोई शहर भाग गया। और ...