काँच के सपनों वाली लड़की
काँच के सपनों वाली लड़की गाँव के एक कोने में रहती थी राधा, जो पढ़ाई में तो होशियार थी लेकिन घर की तंगी ने उसके सपनों को कई बार तोड़ने की कोशिश की थी। उसका पिता एक छोटा किसान था, माँ घरों में काम करती थी। राधा को हमेशा से लगता था कि वो कुछ बड़ा कर सकती है, लेकिन हालात बार-बार उसे नीचे खींचते। पढ़ाई के लिए राधा को रोज़ 5 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। स्कूल जाने के लिए साइकिल नहीं थी, लेकिन उसके हौंसले की कोई सीमा नहीं थी। गाँव के बाकी लोग कहते थे — "लड़की हो, पढ़ के क्या करोगी?" लेकिन वो मुस्कुराकर सब सुनती और मन ही मन कहती, "मैं एक दिन सबको दिखाऊंगी।" सपनों से लड़ाई राधा को 12वीं बोर्ड में टॉप किया, लेकिन कॉलेज में दाखिला लेना उसके परिवार के लिए सपना जैसा था। उसके पास न फीस थी, न किताबें। लेकिन हार मानने वालों में वो नहीं थी। उसने गाँव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। दिन में पढ़ती, शाम को दूसरों को पढ़ाती। धीरे-धीरे इतना पैसा इकट्ठा हुआ कि उसने कॉलेज की फीस भर दी। सफलता की सीढ़ी कॉलेज में भी राधा ने मेहनत छोड़ी नहीं। किताबें पुरानी थीं, मोबाइल भी नहीं था, लेकिन ...