"मैं फिर उठूंगा" – एक प्रेरणादायक कविता
"मैं फिर उठूंगा" – एक प्रेरणादायक कविता
Intro (परिचय):
ज़िन्दगी में हार मान लेना सबसे आसान होता है, लेकिन जीत उसी की होती है जो गिरकर फिर से उठता है। यह कविता हर उस इंसान के लिए है जो कभी टूटा, लेकिन रुका नहीं।
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मैं फिर उठूंगा
(Ek Prernadayak Kavita)
गिरा था जब, लोग हंसे थे,
कहा था सबने – "अब ये क्या करेगा?"
पर मैंने खामोशी को अपनी ढाल बनाया,
और खुद से वादा किया – "अब मैं कुछ कर दिखाऊंगा।"
ठोकरों ने सिखाया चलना,
अंधेरों ने पहचान दी उजालों की,
जो लोग मेरी हार का जश्न मना रहे थे,
वो आज मेरे आगे सलाम करते हैं चालों की।
कभी भूख थी सपनों की,
अब वही सपने मेरी ताक़त बन गए,
जो कल हँसी उड़ाते थे मेरी मेहनत पर,
आज वही मेरे साथ चलने के लिए तरस गए।
मैं टूटा, बिखरा, मगर रुका नहीं,
हर बार गिरा, पर झुका नहीं।
अब हालात नहीं, मैं खुद को बदल चुका हूँ,
मैं एक चिंगारी था, अब आग बन चुका हूँ।
मत समझो मुझे कमजोर अब,
मेरे इरादे हैं अब पत्थर से भी सख्त,
मैं फिर उठूंगा, हर बार और मजबूती से,
क्योंकि अब मैं जान चुका हूँ –
हारने वाले नहीं, लड़ने वाले इतिहास बनाते हैं।
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